
AuthorsWiki को साक्षात्कार के लिए अपना कीमती समय देने के लिए नन्हें सिंह ठाकुर जी का धन्यवाद करते हैं। मध्य प्रदेश निवासी लेखक नन्हें सिंह ठाकुर जी पेशे से एक शिक्षाविद् हैं और वर्तमान में शिक्षा जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय दमोह, मध्य प्रदेश मे सहायक संचालक के रूप में कार्यरत हैं। नन्हें सिंह ठाकुर जी शिक्षाविद् होने के साथ ही साहित्य लेखन में रूचि रखते हैं। नन्हें सिंह ठाकुर जी के साथ साक्षात्कार बहुत ही प्रेरक है। AuthorsWiki को दिए गए साक्षात्कार में नन्हें सिंह ठाकुर जी ने अपनी साहित्यिक यात्रा के साथ ही जीवन के खट्टे-मीठे अनुभवों को भी हमारे साथ शेयर किया। आशा करते हैं कि पाठकों को लेखक नन्हें सिंह ठाकुर जी का साक्षात्कार पसंद आएगा। साक्षात्कार के कुछ प्रमुख अंश आपके लिए प्रस्तुत हैं-
AuthorsWiki : नन्हें सिंह ठाकुर जी, नमस्कार। हम आपका शुक्रिया करना चाहते हैं क्योंकि आपने हमें साक्षात्कार के लिए अपना कीमती समय दिया। यदि आप अपने शब्दों में आप अपना परिचय देंगें, तो सम्मानित पाठक आपके बारे मे ज्यादा जान पायेंगे?
नन्हें सिंह ठाकुर : मैं नन्हें सिंह ठाकुर दमोह मप्र में निवासरत हूँ। मेरा गांव रुसन्दों दमोह जिले की बटियागढ तहसील में स्थित छोटा सा गांव है, एक मध्यवर्गीय किसान परिवार में मेरा जन्म सन् 1963 में हुआ था। मेरी प्राथमिक शिक्षा गांव के शासकीय स्कूल में हुई। मिडिल स्कूल की शिक्षा के लिए दादा जी ग़ुलाब सिंह जी ने हटा जैसे बड़े कस्बें में पढ़ने भेजा वहां से उच्च शिक्षा के लिए दमोह नगर आया तो यही का हो गया। मप्र शासन के शालेय शिक्षा विभाग में शिक्षक, व्याख्याता भूगोल, सर्वशिक्षा अभियान में विकासखंड स्रोत समन्वयक पटेरा दमोह, प्राचार्य हायर सेकेण्डरी स्कूल के दायित्वों का निर्वहन करके अभी सहायक संचालक शिक्षा जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय दमोह मप्र में पदस्थ हूँ।
AuthorsWiki : आपकी पुस्तक ‘काम कला शिल्प के मंदिर खजुराहो’ पिछले दिनों ही प्रकाशित हुई है, उसके बारे में जानकारी दे, ताकि पाठक आपकी किताब के बारे में ज्यादा जान सकें?
नन्हें सिंह ठाकुर : काम कला शिल्प के मंदिर-खजुराहो यात्रा संस्मरण की किताब है। इस किताब में हिमालय से लेकर दक्षिण भारत बैंगलोर केरल, राजस्थान वा गुजरात की बारह यात्रा संस्मरण एवं दमोह जिले के राष्ट्रीय स्तर की धरोहरें जो बचपन से देखीं है उनके आठ संस्मरण इस पुस्तक में शामिल हैं। पुस्तक में कुल बीस संस्मरण है जिन्हें पढ़कर पाठकों के मन में इन स्थानों पर पर्यटन करने की इच्छा निश्चित रूप से जागृत होगी। संक्षिप्त में बता दूं यह यात्रा के विवरण मात्र नहीं है बल्कि उक्त स्थलों को देखकर जो एक दृष्टि, भाव जगत में उतरकर दर्शन पैदा करती है उसका नाम ही वास्तव में संस्मरण है। संस्मरण प्रकृति का आभार ज्ञापन है। संस्मरण प्रकृति दर्शन की बारंबारता है। जो हम स्थूल दृष्टि से देखते हैं, उसे अंत: एवं भाव दृष्टि में उतर कर पुनः देखना ही संस्मरण है। आशा करता हूँ यह पुस्तक पाठक को सैलानी बनाने के लिए उत्प्रेरक का काम करेंगी। इसे जरूर पढ़ें और घर की लायब्रेरी में रखें।लेखक के रूप में ना सही एक शिक्षक के रूप में मेरी इस अपील को स्वीकार करने की प्रार्थना है।
AuthorsWiki : नन्हें सिंह ठाकुर जी, पुस्तक प्रकाशित कराने का विचार कैसे बना या किसी ने प्रेरणा दी?
नन्हें सिंह ठाकुर : मैं अभी कुछ दिन पहले हटा दमोह में निवासरत प्रसिद्ध ललित निबंधकार एवं प्रतिष्ठित साहित्यकार डॉ. श्याम सुन्दर दुबे जी की आत्मकथा “अटकते भटकते” पढ़कर एक संक्षेपिका लिखीं और दुबे जी से भेंट की तो उन्होंने प्रेरित कर कहा – “उम्र ढलने से पहले जो आपके पास अनुभव भंडार है उसे लिपिबद्ध करते रहिए लेखन विधा कोई भी हो। आपके भावों की उदात्तता और लेखनी का प्रवाह ही विधा को प्रभावी बना देता है।” इसलिए दुबे जी ही इस संस्मरण लेखन के प्रेरक है पुस्तक की प्रस्तावना भी उन्होंने लिखी है। दुबे जी भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय में सलाहकार समिति के सदस्य भी हैं।
AuthorsWiki : पुस्तक के लिए रचनाओं के चयन से लेकर प्रकाशन प्रक्रिया तक के अनुभव को पाठकों के साथ साझा करना चाहेंगें?
नन्हें सिंह ठाकुर : जी हां, ज़रूर। करोना काल के संकट के दौरान मुझे लगता है कि बाह्य जगत के साथ मनुष्य के अन्तर्जगत में भी बड़ा परिवर्तन हुआ है। स्वाध्याय मेरी रुचि है कोविड काल के दौरान अनेक पुस्तकें पढ़ी तथा चार पुस्तकें काव्य संग्रह की विगत छै: माह में मेरी प्रकाशित भी हो गई। मैंने 12 यात्राओ के संस्मरण लिखकर रखे थे तथा एक अच्छे प्रकाशक की तलाश में था, तभी प्राची डिजिटल पब्लिकेशन से संपर्क हुआ तो उन्होंने कहा कि आप पांडुलिपि की साफ्ट कापी भेजें तभी पृष्ठ संख्या के आधार पर पुस्तक के आकार पर चर्चा होगी। मैंने साफ्ट कापी भेज दी। कुछ समय बाद पब्लिकेशन ने बताया कि पृष्ठ संख्या कुछ कम है तो मैंने फिर पन्द्रह दिन का समय लेकर बचपन से लेकर आज तक अपने जिले में जो देखा उसका लेखा जोखा और हिसाब चुकता करने का ख्याल आया और दमोह जिले की मातृभूमि के विविध ऐतिहासिक, प्राकृतिक, सांस्कृतिक वा धार्मिक धरोहरों पर आठ संस्मरण लिखकर मैं अपने आप में धन्य हो गया।इस तरह बीस संस्मरण पर 92 पेज की एक अच्छी पुस्तक बन गई है। यह पुस्तक पठनीय, रमणीय और स्मरणीय भी है।
AuthorsWiki : आपकी पहली सृजित रचना कौन-सी है और साहित्य जगत में आगमन कैसे हुआ, इसके बारे में बताएं?
नन्हें सिंह ठाकुर : मेरी पहली सृजित रचना “झूले पड़े उदास” है जो 2010 में प्रकाशित हुई थी मेरी डायरी में लिखी कुछ ग़ज़लें और बुंदेली कविताओं का यह वह संग्रह है जिसमें मुझे रदीफ क़ाफिया का मिलान सही नहीं आता था। किन्तु इस पुस्तक की प्रस्तावना भी डॉ श्याम सुन्दर दुबे जी ने लिखी थी और प्रोत्साहित किया था यह कहकर कि लिखते रहना किन्तु कालचक्र में उलझा व्यस्त मनुष्य मै भी हूँ, अंतराल आया फिर कोविड काल ने आपदा में अवसर दिया। अब लेखन सृजन सतत् हो गया है। यह पुस्तक भी इसी आपदा की देन है।
AuthorsWiki : अब तक के साहित्यिक सफर में ऐसी रचना कौन सी है, जिसे पाठकवर्ग, मित्रमंडली एवं पारिवारिक सदस्यों की सबसे ज्यादा प्रतिक्रिया प्राप्त हुई?
नन्हें सिंह ठाकुर : “आशा से आकाश” एक काव्य संग्रह है जिसमें दो सौ कुंडलिया संग्रहीत हैं। सृजन वांग्मय परिषद भोपाल ने दुष्यंत संग्रहालय में एक कवि सम्मेलन आयोजित किया था, जिसमें मेरी इस पुस्तक का विमोचन हुआ था। देश के विविध प्रांतों से पधारे साहित्य मनीषियों के माध्यम से वह किताब सभी जगह पहुंच चुकी थी। उस किताब में एक कुंडलिया फिल्म कलाकार एवं समाज सेवी सोनू सूद पर लिखी थी। शोसल मीडिया से वह कविता सोनू सूद तक पहुंची तो आशा से आकाश की किताब लेने सोनू सूद ने अपना निजी सहायक दमोह भेजा और निजी सहायक ने वीडियो काल के माध्यम से मेरी बात सोनू सूद जी से कराईं, इसके बाद वह पुस्तक बहुत पढ़ी गई। मेरी पहचान एक कुडलीकार कवि के रूप में होने लगीं। मैं किसी एक छंद या विधा में बंधना नहीं चाहता था इसलिए यह पांचवीं पुस्तक गद्य की सबसे अधिक प्रिय विधा संस्मरण को चुना और काम कला शिल्प के मंदिर-खजुराहो आप तक अब पहुंचेगी। यह और अधिक लोकप्रिय होकर पाठकों का आशीर्वाद प्राप्त करेगी। ऐसा मुझे विश्वास है।
AuthorsWiki : नन्हें सिंह ठाकुर जी, किताब लिखने या साहित्य सृजन के दौरान आपके मित्र या परिवार या अन्य में सबसे ज्यादा सहयोग किससे प्राप्त होता है?
नन्हें सिंह ठाकुर : आज जो दुनिया में मेरे साथ है उनमें साहित्य सृजन सहयोगी तो बहुत है किन्तु डॉ श्याम सुन्दर दुबे, डॉ नाथूराम राठौर, डॉ पी एल शर्मा, डॉ इसरार अहमद “गुनेश” एवं अमर सिंह राजपूत जी का सतत् सहयोग मुझे मिलता रहता है जिनसे मैं परिष्कृत और परिमार्जित होता रहता हूँ।
AuthorsWiki : नन्हें सिंह ठाकुर जी, साहित्य जगत से अब तक आपको कितनी उपलब्धियाँ / सम्मान प्राप्त हो चुके हैं? क्या उनकी जानकारी देना चाहेंगें?
नन्हें सिंह ठाकुर : जी हां ज़रूर। वर्ष 1986 में शासकीय हायर सेकेण्डरी स्कूल कुम्हारी जिला दमोह में पदस्थ था तब एक कहानी लिखी थी परिचय। लेकिन ना प्रकाशित हुई ना प्रसारित तभी एक व्याख्याता मित्र थे शेख वसी उल्लाह उन्होंने कहा मुझे दो मैं आकाश वाणी केन्द्र छतरपुर में परामर्श करूंगा। उस समय आकाशवाणी से एक कार्यक्रम युववाणी प्रसारित होता था जिसमें मेरी वह कहानी पढ़ी गई। लेखक के पारिश्रमिक तौर पर जब पचास रुपए का चेक पोस्ट आफिस से आया तो वहीं मेरा सबसे बड़ा पुरुस्कार है। 12 मार्च 2022 को भोपाल में सृजन वांग्मय परिषद द्वारा “राष्ट्रीय स्तरीय स्वामी विवेकानंद शिक्षा भूषण सम्मान 2022” प्रदत्त किया है। फेसबुक पर संचालित राष्ट्रीय तूलिका मंच से प्रदत्त विषय एवं प्रदत विधा पर घनाक्षरी, ग़ज़ल, लघु आलेख, दोहा आदि विधाओं पर “श्रेष्ठ शब्द शिल्पी के सम्मान” अभी तक सात प्राप्त हो चुके हैं।
AuthorsWiki : नन्हें सिंह ठाकुर जी, आप सबसे ज्यादा लेखन किस विद्या में करतें है? और क्या इस विद्या में लिखना आसान है?
नन्हें सिंह ठाकुर : पद्य रचना के लिए दोहा रचना को काव्य जगत का प्रवेश द्वार कहा जाता है। दोहा रचना हर पद्य विधा में पारंगत कर सकता है बशर्ते आप के पास शब्द और अनुभव का भंडार हो। मैंने अभी तक कुंडलिया छंद अधिक लिखा है। जिसमें परेशानी नहीं होती। आगामी संग्रह पद्य एवं गद्य की सभी विधाओं पर आधारित हो मेरा यह प्रयास होगा। पारंगत हुआ कि नहीं यह कहने, परखने का अधिकार पाठक के हाथ में सुरक्षित है।
AuthorsWiki : नन्हें सिंह ठाकुर जी, आप साहित्य सृजन के लिए समय का प्रबंधन कैसे करते हैं?
नन्हें सिंह ठाकुर : शासकीय सेवारत होकर समय का प्रबंधन एक बड़ी चुनौती है। मैं जब भी अपनी नई पुस्तक लेकर किसी मित्र को भेंट देता हूँ तो वह यही प्रश्न करते हैं कि समय कैसे मिलता? मैं हंस देता हूँ। समय का प्रबंधन आपकी इच्छा शक्ति और संकल्प शक्ति करती है, आप जो करना या लिखना चाहते हैं उसे कोई रोक नहीं सकता। पहले मैं प्रेमचंद जी को अपना आदर्श मानता था फिर जब लियो टॉलस्टाय का “अन्ना कारेनिना” उपन्यास पढ़ा तो हतप्रभ था रूस का ऐसा जमीनी चित्रण जैसे मैं रूस में रहकर लौट आया हूँ। कार्ल मार्क्स के बारे में पढ़ा तो हतप्रभ था वह पुस्तकालय में 15-16 घंटे बिता देते थे। हमारे पास 24 घंटे है, आपका संकल्प दृढ़ हो तो समय द्वार पर खड़ा रहता है।
AuthorsWiki : नन्हें सिंह ठाकुर जी, आप अपनी रचनाओं के लिए प्रेरणा कहां से प्राप्त करते है?
नन्हें सिंह ठाकुर : मैं अभी गांधी जी पुस्तक “हिन्द स्वराज” पढ़ रहा था, उसकी प्रस्तावना में वह लिखते हैं – “जो विचार मैंने प्रकट किए हैं वे मेरे है और मेरे नहीं है। मेरे है, क्योंकि उनके अनुसार आचरण करने की मुझे आशा है, वे मेरे अंतर में बस गये हैं। मेरे नहीं है, क्योंकि वे मेरे ही दिमाग़ में उपजे हों, सो बात नहीं है। वे कितनी ही पुस्तकें पढ़ने के बाद बनें है।”
मेरा कहना भी यही है कि सबसे बड़ी उत्प्रेरक महान विभूतियों की जीवनी, संस्मरण और साहित्य की किताबों के अनुशीलन ही बनतें हैं। इसलिए निरंतर पुस्तकों का स्वाध्याय ही मेरी उत्प्रेरणा है।
AuthorsWiki : आपके जीवन में प्राप्त विशेष उपलब्धि या यादगार घटना, जिसे आप हमारे पाठकों के साथ भी शेयर करना चाहते हैं?
नन्हें सिंह ठाकुर : हिमालय की दूसरी यात्रा जुन 2008 में परिवार के साथ करके जब हरिद्वार लौटा तो मेरी वापिस ट्रेन रात में थी। इसलिए परिवार के साथ गंगा घाट पर डुबकी लगाकर एक मंदिर की तरफ जा रहा था तभी एक युवा सा साधु आया और सीधे मुझसे कहा – दूसरी बार केदारनाथ के दर्शन कर के लौट रहे हैं, पशुपति नाथ नहीं गये। पशुपति नाथ तुझे बुला रहे हैं वहां आना उनके आशीर्वाद से एक सुंदर पत्नी से तेजस्वी पुत्र पैदा होगा। यह सुनकर श्रीमती जी को खराब लगा उन्होंने जल्दी भगाने के लिए उस बाबा को नम्रता से 100/ रुपए दिए तो साधु ने नाराज हो कर कहा- नहीं तेरे हाथ से नहीं लूंगा। फिर मैंने दिए तो सिर पर मोर पंख रखकर आशीर्वाद देकर चला गया। बेटी दिव्या जो इंजीनियरिंग में प्रवेश ले चुकी थी वह हंस रही थी पुत्र सौरभ केन्द्रीय विद्यालय की नवमी में प्रवेश रत हुआ था वह कुछ नहीं समझ पाया। कभी आत्मकथा लिखूंगा तो पूरा घटनाक्रम आगे का भी ईमानदारी से लिखूंगा। पशुपति नाथ जाना अभी तक शेष है। यह घटना आज तक नहीं भूला न वह संत वाणी उसे कैसे पता मै केदारनाथ से दूसरी बार लौटा हूँ? पहली बार जून 1992 में गया था।
AuthorsWiki : हर लेखक का अपना कोई आईडियल होता है, क्या आपका भी कोई आईडियल लेखक या लेखिका हैं? और आपकी पसंदीदा किताबें जिन्हें आप हमेशा पढ़ना पसंद करते हैं?
नन्हें सिंह ठाकुर : विश्व के अधिकांश कवि और लेखकों को पढ़ा है।मेरा आदर्श एक अकेला होना और बताना एक कठिन प्रश्न की तरह है। लेखिका के तौर पर पंजाबी कवियत्री अमृता प्रीतम को कह सकता हूँ किन्तु लियो टॉलस्टाय, आचार्य चतुर सेन शास्त्री, रविन्द्र नाथ टैगोर, मुंशी प्रेमचंद वा जयशंकर प्रसाद में से किसी एक को चुनने के बजाय इस पूरे समुच्चय को चुनता हूँ। जहां तक पसंदीदा किताब की बात है तो मैं कहना चाहूँगा कि मैंने प्रायः सभी बड़े साहित्यकारों की किताबें पढ़ी है, हर किताब अनुपम है। फिर भी अमृता प्रीतम की “रसीदी टिकट” बार बार पढ़ना चाहता हूँ। अमृता प्रीतम ने बड़ी बेबाकी से इस छोटी सी आत्मकथा में अपने मन एवं भावों की अन्त: परतों को उधेड़ कर रख दिया है।
AuthorsWiki : हिन्दी भाषा और हिन्दी साहित्य के उत्थान पर आप कुछ कहना चाहेंगे?
नन्हें सिंह ठाकुर : हिंदी भाषा हमारी मातृ भाषा है। इसकी समृद्धि ही भारत का निर्माण और मजबूत भारत करने में सक्षम है। चिकित्सा शिक्षा, तकनीकी शिक्षा के पाठ्यक्रम हिंदी में अनिवार्य रूप में किए जाएं। हिन्दी हमारी आवश्यकताओं में शामिल हो तभी अंग्रेजी का मोह लोगों के मन मस्तिष्क से मिटेगा।
AuthorsWiki : साहित्य सृजन के अलावा अन्य शौक या हॉबी, जिन्हे आप खाली समय में करना पसंद करते हैं?
नन्हें सिंह ठाकुर : साहित्य सृजन के अलावा सैलानी बन कर घूमना मेरा स्वभाव है घूमना ही मेरी रुचि है यही मेरा शौक है।
AuthorsWiki : नन्हें सिंह ठाकुर जी, क्या भविष्य में कोई किताब लिखने या प्रकाशित करने की योजना बना रहें हैं? यदि हां! तो अगली पुस्तक किस विषय पर आधारित होगी?
नन्हें सिंह ठाकुर : मनुष्य के मन में हर दिन तरह तरह के भाव और विचार आते हैं, उन्हीं भाव और विचार को विस्तार देने मैंने लगभग दो सौ पंच दोहा युग्म लिखें है। मतलब एक भाव या विचार पर पांच दोहा तो ऐसे कुल एक हजार दोहा है जो दोहा सहस्त्रावली या किसी अन्य नाम से पुस्तक प्रकाशित होगी। सौ गीत भी तैयार हैं जिन का परिष्करण कार्य चल रहा है। गीत के बिना कवि या लेखक अधूरा है। गीत अन्तस का गान है, गीत श्रृंगार और ओज का सम्मिश्रण है। यह श्रृंगार और शौर्य ही जीवन सरिता का पवित्र प्रवाह है। इसमें नहाएं बिना मनुष्य का जीवन अधूरा है। शीघ्र ही “युग गीतांजलि” प्रकाशित होंगी। इसके बाद ग़ज़ल संग्रह का विचार है। ग़ज़ल दर्द और श्रृंगार की बांसुरी है यह बांसुरी जब तक बजती है तब तक जीवन की सांसें चलती है। हर मनुष्य का जीवन एक ग़ज़ल है। आत्मकथा वह विधा है जिसमें लेखक अपना जीवन हमाम अपने पाठकों के लिए खोल देता है। अपने साथ कुछ लेकर नहीं जाना चाहता। अपने कर्म और भाव संपदा की गठरी खोलकर अपने पाठकों को बांट देता है। इसके लिए कुछ सालों का इंतजार करना पड़ेगा।
AuthorsWiki : साहित्य की दुनिया में नये-नये लेखक आ रहे है, उन्हें आप क्या सलाह देगें?
नन्हें सिंह ठाकुर : रचनाकार मेरी दृष्टि में नया पुराना नहीं होता। रचनाकार की रचना ही उसकी पहचान होती है। सभी रचनाकारों से निवेदन करूंगा। अपने मनपसंद कवि और लेखकों को पढ़ते रहिए। लेखक से बड़ा पाठक होता है। पुस्तक का सच्चा साधक पाठक ही है। पहले पाठक बनें। जितने अच्छे आप पाठक होंगे उतने अच्छे अभिभाषक, वक्ता और लेखक बनेंगे। अंत में यही कहूँगा – पढ़ते रहिए।
AuthorsWiki : क्या आप भविष्य में भी लेखन की दुनिया में बने रहना चाहेंगे?
नन्हें सिंह ठाकुर : जी हां, जरूर यह बात तो ऊपर ही पहले आ चुकी है। लेखन कोई पृथक से किया गया कार्य नहीं है। जैसे मनुष्य विधाता की रचना है वैसे ही मनुष्य जाने अंजाने जो करता है वह रचना बनती जाती है, कुछ को अक्षर मिलते हैं तो छंद बन जाते जो अव्यक्त रहते हैं वह मूक रचना बनकर अपनी संतति के श्रम साधक बनकर सनातन को आगे बढ़ाते रहते हैं। मेरी दृष्टि में हर जीव रचनाकार हैं। चिड़ियां घौंसला की रचना कर उसमें अपनी जीवंत रचनाएं रखकर पालती है, मधुमक्खी का छत्ता परागरस संग्रहीत कर बड़ी मीठी रचना बनाती है, हम मनुष्य ही विषैले है जो जाति, धर्म, भाषा, पंथ भू-खंड के भेद पैदा करके ज़हर बेल को मन में पालते हैं। यदि हमारे हाथ में कलम है तो हर कलमकार को यह जहर बेल कुतरने के लिए सतत् रूप से अपनी कलम चलानी चाहिए। इसलिए मेरा भविष्य ही मेरी कलम है जो रुकेगी नहीं, थमेगी नहीं।
AuthorsWiki : नन्हें सिंह ठाकुर जी, यह अंतिम प्रश्न है, आप अपने अज़ीज शुभचिन्तकों, पाठकों और प्रशंसकों के लिए क्या संदेश देना चाहते हैं?
नन्हें सिंह ठाकुर : सभी शुभचिंतक और पाठकों से निवेदन है कि पुस्तकें गीता, बाइबिल, कुरान और गुरु ग्रंथ साहिब होती है। इनमें दिए संदेश को समझ कर वैसा बनने के प्रयास करें। पुस्तकें जीवंत देव प्रतिमाएं हैं, इन्हें घर में जगह दें। यह आपके घर को ज्ञान प्रकाश से भर देंगी। पुस्तकें जरूर पढ़ें। पसंद ना हो तो भी मन की कड़वी दवा समझकर ही पढ़ें। मन के रोग और दोष का पुस्तकें ही उपचार करती है। पुस्तकें पढ़ें, खूब हंसे, शैलानी बन कर घूमें खुश रहें, खुश रखें। धन्यवाद।
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